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शाहजहांपुर ,गबन कराने के मुख्य दोषी हैं डीपीआरओ पवन कुमार व तत्कालीन एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव:सूत्र.

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शाहजहांपुर ,गबन कराने के मुख्य दोषी हैं डीपीआरओ पवन कुमार व तत्कालीन एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव:सूत्र


गबन के मुख्य षड्यंत्रकारी बड़े अधिकारी का सिर्फ निलंबन


 छोटे कर्मचारियों पर निलंबन व एफआईआर दोनों कार्रवाई


डीपीआरओ ने अपने कार्यालय को मॉडिफाई कराने में खर्च किए लाखों रुपए


कार्यालय मॉडिफाई करने में किस मद से खर्च किये लाखों ?


बड़े अधिकारियों ने जिला पंचायत राज अधिकारी को ही बना दिया मुकदमे का वादी

दिनेश मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार

शाहजहांपुर/कलान

कलान में हुए लगभग 1600000 रुपए के गबन के मुख्य षड्यंत्र करता दोषी जिला पंचायत राज अधिकारी पवन कुमार और तत्कालीन एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव दोषी है।कथित तौर पर विश्वस्त सूत्रों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि गबन कराने की पटकथा जिला पंचायत राज अधिकारी पवन कुमार और तत्कालीन एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव ने ही लिखी थी। फिर भी इस बड़े गबन के मामले में एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव पर अभी तक शासन प्रशासन द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई है। बड़े अधिकारी डीपीआरओ पर सिर्फ निलंबन की ही कार्रवाई शासन स्तर से की गई। छोटे कर्मचारियों तत्कालीन एडीओ पंचायत धनराज ग्राम पंचायत अधिकारी अरुण निगम जैसे छोटे कर्मचारियों पर मुकदमा दर्ज कराने के साथ ही निलंबन की कार्रवाई भी की गई।यहां तक कि संविदा कर्मचारी कंप्यूटर ऑपरेटर केसरीनंदन और एडीपीएम देवीलाल मौर्य की भी सेवाएं समाप्त कर दी गई।

वहीं सूत्रों की माने तो डोंगल एक्टिवेशन के दौरान ओटीपी जिला पंचायत राज अधिकारी पवन कुमार व सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) एडीओ पंचायत के मोबाइल पर जाता है। जिसे वे लोग सचिव को शेयर करते हैं।तभी धन का ट्रांजक्शन हो सकता है। इतना सब कुछ होने के बाद भी डीपीआरओ पवन कुमार ने एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव का बचाव करते हुए उन पर एफआईआर दर्ज नहीं कराई। मामला जब अधिक उछला तो उन्होंने कलान से हटाकर प्रेम सागर यादव को मिर्जापुर में स्थानांतरित कर दिया। सूत्रों का दावा है कि डीपीआरओ पवन कुमार ने  जिला पंचायत राज अधिकारी कार्यालय को मॉडिफाई कराने में लगभग ₹ छः लाख खर्च किया। अब ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर निलंबित जिला पंचायत राज अधिकारी पवन कुमार ने कार्यालय मोडीफाई कराने के लिए लगभग ₹ छःलाख किस मद से व्यय किये ? दूसरा सवाल यह है कि क्या निलंबित जिला पंचायत राज अधिकारी पवन कुमार ने अपनी जमीन बेचकर या अपनी जेब से अपने कार्यालय को मॉडिफाई कराया।

वहीं डीपीआरओ कार्यालय का मॉडिफाई कराने खर्च हुए धन के संबंध में जानकारी लेने के लिए जब मुख्य विकास अधिकारी शाहजहांपुर श्यामबाबू सिंह से उनके सीयूजी मोबाइल पर कॉल कर जानकारी चाही गयी तो उनका फोन रिसीव नहीं हुआ।


*डीपीआरओ पवन कुमार ने ही शासकीय धन आहरित करने का दिया था आदेश*

कथित तौर पर सूत्रों का दावा है कि निलंबित जिला पंचायत राज अधिकारी पवन कुमार ने ही सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव को आदेश जारी कर शासकीय धन को आहत करने को कहा था। सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि निलंबित ग्राम पंचायत अधिकारी अरुण कुमार निगम के डोंगल एक्टिव करने से पहले तत्कालीन ग्राम पंचायत अधिकारी सचिव शशिबिन्द पाल को भी एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव अपने साथ लेकर जिला पंचायत अधिकारी के कार्यालय पर गए थे और डीपीआरओ पवन कुमार व एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव ने शशिबिन्द पाल से अपना डोंगल लगाने को भी कहा था। जो शासकीय धन राशि गबन करनी थी।उसकी 20% धनराशि देने का ऑफर दिया था। लेकिन ग्राम पंचायत अधिकारी शशिबिन्द पाल तैयार नहीं हुए और बैरंग वापस लौट आए। सूत्रों ने बताया कि इस गबन की जानकारी सबसे पहले इसीलिए ग्राम पंचायत अधिकारी शशिबिन्द पाल को हुयी थी और उन्होंने ही सबसे पहले 19 अगस्त को ही जिला पंचायत राज अधिकारी पवन कुमार को गवन के मामले में लिखित शिकायत पत्र दिया था।

*गबन के मुख्य षड्यंत्रकारी अधिकारी को ही बना दिया मुकदमे का वादी*

लगभग 16 लाख के गबन के इस मामले की जांच उपनिदेशक पंचायत देवीपाटन मंडल गोंडा आर एस चौधरी ने की थी और पंचायत निदेशक स्तर से निर्देश जारी कर कहा गया था कि इस मामले में दोषी सभी लोगों के विरुद्ध मुकदमा पंजीकृत किया जाए। जांच अधिकारी की जांच आख्या में यह भी स्पष्ट किया गया कि एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव की भूमिका संदिग्ध है।इसके बावजूद भी डीपीआरओ पवन कुमार ने एडीओ पंचायत प्रेम सागर यादव के विरुद्ध एफआईआर दर्ज नहीं कराई। बताते हैं कि जिला पंचायत राज अधिकारी पवन कुमार को भनक लगी कि पुलिस कलान से केसरी नंदन को गिरफ्तार कर लेगी। इससे पहले ही डीपीआरओ ने फोन कर केसरीनंदन को बहाने से अपने पास बुला लिया था। इसके बाद उसे क्या बयान देना है समझा कर ही उच्चाधिकारियों के सामने पेश किया। सूत्रों ने यह भी बताया कि डीपीआरओ पवन कुमार किसी भी सूरत में मुकदमा लिखाने को तैयार नहीं थे। वह इस मामले को दबाना चाहते थे।लेकिन शासन स्तर के अधिकारियों के दबाव में उन्हें मजबूरन मुकदमा लिखाना पड़ा।

 मजे की बात तो यह है कि गबन की पटकथा लिखने वाले मुख्य षड्यंत्रकारी बड़े अधिकारी डीपीआरओ पवन कुमार को ही इस मुकदमे का वादी बनाया गया है। ऐसे में सवाल उठता है क्या मुकदमा के वादी डीपीआरओ पवन कुमार ट्रायल के दौरान उसी ढंग से इस मुकदमे की पैरवी करेंगें। जिस ढंग से वादी को मुकदमे की पैरवी करना चाहिए ?

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