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हरदोई,लाइट ऑफ एशिया,महात्मा बुद्ध का ज्ञान,देश और दुनिया के लिए कल्याणकारी : अम्बरीष .

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बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष


हरदोई,लाइट ऑफ एशिया,महात्मा बुद्ध का ज्ञान,देश और दुनिया के लिए कल्याणकारी : अम्बरीष 


हरदोई।शिव सत्संग मण्डल के केन्द्रीय संयोजक अम्बरीष कुमार सक्सेना के अनुसार भगवान बुद्ध ने मानव जाति के कल्याण के लिए सत्य की खोज करके सर्व समाज को उपदेश दिया था।पूरी दुनिया में भगवान बुद्ध की 63 देशों में पूजा होती है। भगवान बुद्ध को मानने वाले देश बहुत विकसित हैं।भगवान बुद्ध ने वैज्ञानिक धर्म की खोज की थी। आज देश और दुनिया में फैली अशांति को समाप्त करने के लिए बुद्ध धर्म की आवश्यकता है।

महात्मा बुद्ध का जन्म इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय कुल में राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी मां का नाम महामाया था। जिनका बुद्ध के जन्म के एक सप्ताह बाद निधन हो गया।उनका पालन पोषण महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापति गौतमी ने किया। जो महामाया की मृत्यु के बाद राजा शुद्धोधन की दूसरी रानी बनी। इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ रखा गया।

सिद्धार्थ के बचपन के गुरु का नाम विश्वामित्र था। जिनसे उन्होंने वेदों एवं उपनिषदों की शिक्षा ग्रहण की और उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा जैसे राज काज और युद्ध विद्या की शिक्षा ली। बचपन से लेकर युवा अवस्था तक उन्होंने कुश्ती, घुड़दौड़, तीर कमान ,रथ हांकना आदि शिक्षायें ग्रहण की। 


16 वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा नाम की कन्या से हुआ। पिता के द्वारा बनाए ऋतुओं के अनुरूप बनाए गए वैभवशाली और समस्त भोग-बिलासों से युक्त महल में यशोधरा के साथ रहने लगे। यहां उन्हें यशोधरा से एक पुत्र का जन्म हुआ। जिसका नाम राहुल रखा गया। 


जब सिद्धार्थ एक छोटा बालक था। तब कुछ विद्वान संतो ने भविष्यवाणी की थी। कि यह लड़का या तो एक चक्रवर्ती राजा बनेगा या एक महान संत बनेगा। परंतु उनके पिता सिद्धार्थ को एक राजा बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने उन्हें विलासिता की सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई और उन्हें किसी भी प्रकार के धार्मिक, आध्यात्मिक ज्ञान से दूर रखा। उनके पिता शुद्धोधन सिद्धार्थ को मानव जीवन की कठिनाइयों और दुखों के बारे में जानने देना नहीं चाहते थे। क्योंकि वह डरते थे कि कहीं इस तरह के ज्ञान से उनका पुत्र सन्यास की ओर न बढ़ जाये। इसलिए उन्होंने अपने बेटे को आध्यात्मिकता से दूर करने के लिए बहुत से प्रयत्न किए और उन्हें उम्र बढ़ने और मृत्यु जैसी प्रक्रियाओं के ज्ञान से दूर ही रखा।


परंतु एक अंतराल बाद पूरा जीवन महलों तक सीमित रहने के कारण युवा सिद्धार्थ महल से बाहर जाने के लिए उत्सुक हो गए और वे अपने सारथी के साथ नगर भ्रमण के लिए निकल पड़े। नगर में यात्रा करते समय उनके मन में वैराग्य उत्पन्न करने वाले चार दृश्यों को उन्होंने देखा। जर्जर शरीर वाला बूढ़ा व्यक्ति,रोगी व्यक्ति ,एक अर्थी और

बहुत प्रसन्न मुद्रा में सन्यासी को देखा।


इन दृश्यों को देखने के बाद उन्होंने सारथी से पूछा तो सारथी ने कहा कि हर व्यक्ति के जीवन में बुढ़ापा आने पर वह रोगी हो जाता है और रोगी होने के बाद मृत्यु को प्राप्त करता है। फिर उन्होंने चौथे दृश्य सन्यासी के बारे में पूछा तो सारथी ने कहा कि एक संन्यासी ही है। जो मृत्यु के पार अर्थात मोक्ष के लिए जीवन की खोज में निकलता है।

 यह सब जानने के बाद सिद्धार्थ के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। सिद्धार्थ ने सभी तरह के भोग- विलास अर्थात महलों तथा शारीरिक सुखों को त्याग कर वैराग्य का रास्ता चुनने का निर्णय लिया और पुत्र जन्म के कुछ समय पश्चात ही उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया। 

वैराग्य उत्पन्न होने के बाद 29 वर्ष की उम्र में भगवान बुद्ध ने गृह त्याग कर दिया और जन्म से लेकर मरण तक अर्थात प्रकाश व सच्चाई की खोज में घर से निकल गए।


सन्यासी होने के बाद भी सिद्धार्थ गौतम को अभीष्ट ज्ञान नहीं मिला। जन्म-मरण से संबंधित अनेक प्रश्नों के उत्तर उन्हें नहीं मिले। अतः तब उन्होंने अकेले साधना करने का निश्चय किया। निरंजना नदी पार करके वे धंगश्री पर्वत पर पहुंचे। यहां उन्होंने जंगल में अपने पांच अन्य साथियों के साथ शरीर पीड़ा तप करने लगे। आत्म पीड़न करते वक्त गौतम ने शरीर को अत्यधिक कष्ट दिए कई दिनों तक भोजन से विरक्त रहे। इसके चलते वे शरीर से बहुत दुर्बल हो गए थे। अचानक उन्हें लगा कि शरीर और चित् एक ही अस्तित्व के अंग हैं।

तब उन्होंने संकल्प किया कि स्वास्थ्य संभाल कर साधना करेंगे।

उसके तत्पश्चात वह उरुवेला ग्राम में पीपल वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे पद्मासन लगाकर बैठे और साधना करने लगे।वहीं सिद्धार्थ को सच्चा ज्ञान अर्थात आत्मबोध प्राप्त हुआ। तभी से  वे बुद्ध कहलाये। जिस पीपल के वृक्ष के नीचे  सिद्धार्थ को  बोध मिला वह बोधिवृक्ष  कहलाया।वह स्थान बोधगया है।  ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद वे बेहद  सरल पाली भाषा में धर्म का प्रचार- प्रसार  करते रहे। उनके धर्म की लोकप्रियता तेजी से  बढ़ने लगी। काशी के पास मृंगदाव वर्तमान के सारनाथ पहुंचे। वही  पर उन्होंने  अपना पहला धर्मोपदेश दिया।

उन्होंने जाना कि जिसका निर्माण होता है। वह एक दिन नष्ट भी होता है। अतः जीवन सागर की लहरों जैसा है। लहरें कभी उठती हैं। तो कभी गिरती हैं। मगर सागर का ना तो जन्म होता है। ना ही मृत्यु होती है। जीवन में जन्म से लेकर मरण तक की सभी घटनाओं तथा लोभ, तृष्णा, अहंकार,दुख का निवारण कैसे करें इन सभी रहस्यों को जाना उनका गहन अध्ययन किया।और उन्होंने सभी रहस्यो को जाना बाद में उन्होंने इन्हें चार आर्य सत्य कहा।

 35 वर्ष की उम्र में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। उसके पश्चात वे सिद्धार्थ से गौतम अर्थात सम्यक बुद्ध हुए और बुद्ध कहलाए। उन्होंने संपूर्ण जगत का परम ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

आज का दिन गौतम बुद्ध के अनुयायियों के लिए खास है। भगवान बुद्ध ने पूरी दुनिया को शांति और सद्भावना का संदेश दिया। बौद्ध बिहारों मे विशेष तौर पर झांकी सजाई जाती है। वैसाख महीने की पूर्णिमा के दिन ही भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था।इसी दिन उनका महापरिनिर्वाण हुआ।इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है।

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