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कानपुर,दुर्गा ने पहले खुद लड़ी टीबी से जंग, टीबी चैंपियन बन निभा रहीं दूसरों का संग.

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कानपुर,दुर्गा ने पहले खुद लड़ी टीबी से जंग, टीबी चैंपियन बन निभा रहीं दूसरों का संग

मरीजों को ढूंढने और समझाने का कार्य कर रहीं दुर्गा 

लाइलाज नहीं क्षय रोग समझाते हैं टीबी चैंपियन


कानपुर 22 अगस्त 2022 


टीबी लाइलाज बीमारी नहीं है, बशर्ते इसका समय से उपचार शुरू कर दिया जाए। इसमें लापरवाही की तो यह गंभीर रूप धारण कर सकती है। टीबी को मात देकर आज कई लोग टीबी चैंपियन बनकर दूसरों को टीबी से उबारने में मदद कर रहे हैं। शिवालय निवासी दुर्गा एक ग्रहणी हैं। वर्ष 2019 में टीबी रोग ने उन्हें अपनी गिरफ्त में लिया। शुरू में वह आस-पास के चिकित्सकों से उपचार कराती रहीं पर रोग ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था। तभी एक रिश्तेदार की सलाह पर उन्होंने सिविल लाइन्स स्थित क्षय रोग केंद्र में जांच कराकर उपचार शुरू किया। नियमित दवा कासेवन व परहेज का नतीजा रहा कि अब वह पूरी तरह स्वस्थ तो है हीं “टीबी चैम्पियन”बनकर इस रोग को खत्म करने की मुहिम का हिस्सा भी बन चुकी है।


45 वर्षीय दुर्गा के दो बेटे और बेटियां हैं। दुर्गा के मुताबिक दो साल पहले फरवरी 2019 में उन्हें पता चला कि उन्हें टीबी हो गई है। जब मुझे टीबी का पता चला मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पति को भी शारीरिक अस्वस्थता है। दुर्गा ने बताया की उनके गले में गाँठ जैसा कुछ था और काफी दिनों से ख़ासी भी आ रहीं थी। वह जब प्राइवेट डॉक्टर को दिखाने गयीं तब कुछ टेस्ट हुए और फिर टीबी की पुष्टि हुई। फिर एक रिश्तेदार की सलाह पर सरकारी केंद्र गये और इलाज पूरा किया। छह माह के नियमित इलाज के बाद उन्होंने टीबी की रिपोर्ट निगेटिव आई। इस दौरान उन्हें निक्षय पोषण योजना के तहत 500 रुपये प्रतिमाह के हिसाब से कुल तीन हजार रुपये मिले।सरकारी अस्पताल में हुए निःशुल्क उपचार, चिकित्सकों की सलाह, दवाओं के नियमित सेवन व परहेज का नतीजा है कि वह आज पूरी तरह स्वस्थ हैं।


टीबी चैम्पियन दुर्गा बताती हैं कि मैं अपने अनुभव के आधार पर लोगों को समझाती हूँ कि अगर दो हफ्ते से अधिक खांसी आ रही है, बुखार बना रहता है, वजन घट रहा है, भूख नहीं लगती तो वह टीबी की जांच जरूर कराएं । यह भी बताती हैं कि इसकी जांच सरकारी अस्पतालों में मुफ्त की जाती है। जांच में यदि टीबी की पुष्टि होती है तो घबराना नहीं चाहिए। इसका पूर्ण इलाज संभव है। इसकी दवा टीबी अस्पताल, डॉट सेंटर या स्थानीय आशा कार्यकर्ता के माध्यम से मुफ्त प्राप्त की जा सकती है । दुर्गा कहती हैं कि हम यह बात सभी को जरूर समझाते है कि दवा को बीच में छोड़ना नहीं है, नहीं तो टीबी गंभीर रूप ले सकती है। इस तरह हम अपने अनुभवों को समुदाय से साझा करलोगों को इस रोग के प्रति जागरूक कर रहे हैं।


जिला क्षय रोग अधिकारी डा. एपी मिश्रा बताते हैं कि वर्ष 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाने को स्वास्थ्य विभाग ने ठान रखा है। इसके लिए चलायी जा रही  मुहिम में ‘टीबी चैम्पियन’ भी मददगार साबित हो रहे हैं। वह बताते हैं कि दरअसल जिले में टीबी चैंपियन उन लोगों को चुना गया है जो कि पहले टीबी ग्रसित थे। जांच में टीबी की पुष्टि होने पर उन्होंने चिकित्सक के सुझाव के अनुसार दवा का नियमित सेवन कर बीमारी को मात दिया। अब वह पूरी तरह से स्वस्थ हैं और सामान्य जिंदगी जी रहे हैं । इसके साथ ही अपने अनुभवों को समुदाय तक पहुंचाकर अब वह टीबी रोग के प्रति लोगों को जागरूक कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें  प्रशिक्षण भी दिया गया है।

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